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होयाष्टमी व्रत 2025 – तिथि, महत्त्व, कथा और पूजन विधि

भारत विविध त्योहारों और व्रतों की पावन भूमि है। यहाँ प्रत्येक पर्व और उपवास किसी न किसी धार्मिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। इन्हीं व्रतों में से एक है होयाष्टमी व्रत। यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और रक्षा की कामना से रखा जाता है। यह व्रत उत्तर भारत के कई हिस्सों में बड़े श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है।

होयाष्टमी व्रत कब मनाया जाता है?

होयाष्टमी व्रत भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह तिथि सामान्यत: जन्माष्टमी के कुछ दिनों बाद आती है। वर्ष 2025 में यह व्रत [14/10/2025] को मनाया जाएगा।

होयाष्टमी व्रत का महत्व

  1. संतान की दीर्घायु के लिए – इस व्रत का सबसे बड़ा महत्व संतान की लंबी उम्र और स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है।

  2. परिवार की समृद्धि – मान्यता है कि जो माता श्रद्धा से यह व्रत करती हैं, उनके घर में कभी दरिद्रता नहीं आती।

  3. धार्मिक आस्था – यह व्रत नारी शक्ति की आस्था और अपने परिवार के प्रति निस्वार्थ भाव को दर्शाता है।

  4. पाप मुक्ति – शास्त्रों में वर्णित है कि इस व्रत से किए गए पुण्य से पिछले जन्मों के दोष भी शांत होते हैं।

व्रत की कथा

होयाष्टमी व्रत से जुड़ी कथा प्राचीन काल से प्रचलित है।

कथा के अनुसार, एक बार राजा की रानी ने इस व्रत का पालन नहीं किया और भूलवश अन्न का सेवन कर लिया। इसके परिणामस्वरूप उसका पुत्र गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। तब किसी साधु ने रानी को समझाया कि यह सब व्रत न करने के कारण हुआ है। रानी ने अपनी भूल स्वीकार की और श्रद्धापूर्वक अगली अष्टमी को होयाष्टमी व्रत किया। चमत्कार स्वरूप उसका पुत्र स्वस्थ हो गया।

तभी से यह व्रत “संतान रक्षा और लंबी आयु” के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

व्रत एवं पूजन विधि

  1. प्रातः स्नान – व्रती प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  2. संकल्प – ईश्वर का ध्यान करके संतान की रक्षा एवं परिवार की सुख-समृद्धि का संकल्प लें।

  3. अष्टमी पूजन – इस दिन विशेष रूप से भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान कृष्ण की पूजा का विधान है।

  4. होम-दीपदान – दीप जलाकर व्रत कथा सुनना आवश्यक माना जाता है।

  5. अन्न-जल त्याग – अधिकांश महिलाएँ इस दिन निर्जल उपवास करती हैं। कुछ स्थानों पर फलाहार की भी परंपरा है।

  6. व्रत कथा श्रवण – बिना कथा सुने यह व्रत अधूरा माना जाता है।

  7. अर्घ्यदान – रात्रि को तारे को अर्घ्य देकर व्रत का समापन किया जाता है।

व्रत के नियम

  • व्रत के दिन स्वच्छता और सात्विकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

  • इस दिन झूठ बोलने, परनिंदा करने और क्रोध करने से बचना चाहिए।

  • व्रत के दौरान अन्न, प्याज, लहसुन आदि का सेवन वर्जित होता है।

  • पूजा स्थल पर पूरे दिन दीपक जलता रहना शुभ माना जाता है।

होयाष्टमी व्रत का धार्मिक और सामाजिक पहलू

होयाष्टमी व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह व्रत मातृत्व की गहराई, परिवार के प्रति समर्पण और संतानों के भविष्य की चिंता को दर्शाता है। महिलाओं के लिए यह दिन आध्यात्मिक साधना और मानसिक शांति का अवसर होता है।

निष्कर्ष

होयाष्टमी व्रत भारतीय परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह व्रत न केवल संतान की रक्षा और लंबी उम्र के लिए किया जाता है, बल्कि यह माता-पिता के निस्वार्थ प्रेम और आस्था का भी प्रतीक है। श्रद्धा और विश्वास से किया गया यह व्रत निश्चित ही फलदायी होता है और परिवार में सुख, शांति और समृद्धि लाता है।

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